Solved Question Paper

BHDG-173 Solved Question Paper

This IGNOU BHDG-173 solved paper is designed for B.A. in Applied Sanskrit: builds functional proficiency in Sanskrit language and literature with contemporary applications.

  • Course: Newspaper and Feature Writing
  • Programme: BAASK
  • Session / Term: Jan 2025
  • Last updated: December 4, 2025

Question 1: समाचार पत्र की बनावट और उसके प्रमुख भागों की व्याख्या कीजिए।

समाचार पत्र की मूल संरचना

आज का अख़बार केवल खबरों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि अलग–अलग तरह के पाठकों और ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक पैकेज होता है। हर हिस्से की अपनी भूमिका और भाषा–शैली होती है।

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  • मुखपृष्ठ (फ़्रंट पेज) – दिन की सबसे बड़ी राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय खबरें, मुख्य सुर्ख़ियाँ, बड़ी तस्वीरें और कभी–कभी छोटा संपादकीय कॉलम। यहाँ वही खबरें आती हैं जिनका समाज, राजनीति या अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ता है।
  • राष्ट्रीय/स्थानीय पृष्ठ – राज्य, ज़िले या शहर से जुड़ी ख़बरें; जैसे– सड़क, पानी, बिजली, स्थानीय चुनाव, विद्यालय–कॉलेज, अपराध, नागरिक सुविधाएँ आदि। इन्हें पढ़कर पाठक अपने आस–पास की दुनिया से जुड़े रहते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय पृष्ठ – दूसरे देशों की राजनीति, युद्ध, संधियाँ, विश्व अर्थव्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की गतिविधियाँ। विदेश में रहने वाले परिजनों या पढ़ाई–नौकरी के अवसरों के लिए भी यह खंड महत्वपूर्ण होता है।
  • संपादकीय और विचार पृष्ठ – मुख्य संपादकीय, स्तंभ, लेख, पाठक–पत्र और कार्टून। यहाँ ज़ोर “क्या हुआ?” से ज़्यादा “यह क्यों हुआ?” और “इसके बारे में हमारा दृष्टिकोण क्या हो?” पर होता है।
  • व्यापार/अर्थव्यवस्था पृष्ठ – शेयर बाज़ार, उद्योग–धंधे, बजट, रोज़गार, बैंकिंग, कृषि, उपभोक्ता से जुड़े निर्णय आदि। यह हिस्सा छोटे उद्यमी से लेकर बड़े निवेशक तक के लिए उपयोगी रहता है।
  • खेल पृष्ठ – राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय मैचों की रिपोर्ट, आँकड़े, विश्लेषण, खिलाड़ियों के इंटरव्यू और स्थानीय प्रतियोगिताओं की जानकारी। खेल–प्रेमी अक्सर अखबार का यह हिस्सा सबसे पहले देखते हैं।
  • मनोरंजन/लाइफ़स्टाइल पृष्ठ – फ़िल्म, टीवी, वेब–सीरीज़, फैशन, कला, संस्कृति, रेसिपी, यात्रा आदि पर हल्की–फुल्की पर रोचक सामग्री। कई अख़बारों में यह हिस्सा रंगीन “रविवार पत्रिका” के रूप में आता है।
  • परिशिष्ट, विज्ञापन और घोषणाएँ – रोज़गार, शिक्षा, प्रॉपर्टी, सरकारी टेंडर, नीलामी, मृत्यु–सूचना, वैवाहिक विज्ञापन, धन्यवाद–ज्ञापन आदि। पाठकों के लिए उपयोगी जानकारी के साथ–साथ, यही अख़बार की आर्थिक मज़बूती का बड़ा आधार भी है।

व्यावहारिक दृष्टि

जो विद्यार्थी मीडिया क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि वे केवल “समाचार लेखन” न सीखें, बल्कि हर हिस्से की भाषा, टोन और प्रस्तुति को ध्यान से देखें। उदाहरण के लिए “मंहगाई” विषय पर खबर लिखना, उसी विषय पर संपादकीय या फीचर लिखने से बिल्कुल अलग काम होता है।

Question 2: फ़ीचर लेखन के मुख्य पक्षों की चर्चा कीजिए, उपयुक्त उदाहरणों सहित।

फ़ीचर क्या होता है?

फ़ीचर साधारण समाचार से थोड़ा अलग होता है। इसमें तथ्य तो होते ही हैं, पर साथ में किस्से, वातावरण–वर्णन, संवाद, पात्र और लेखक के अनुभव भी शामिल होते हैं। पाठक को सिर्फ़ “जानकारी” नहीं मिलती, बल्कि किसी विषय को महसूस करने और समझने का मौका भी मिलता है।

फ़ीचर लेखन के प्रमुख पक्ष

  • विषय–चयन – रोज़मर्रा की चीज़ों में भी नयी दृष्टि ढूँढ़ना। जैसे सीधे–सीधे “ट्रैफ़िक जाम” पर लिखने के बजाय, “ट्रैफ़िक जाम में हर दिन फँसने वाले स्कूली बच्चों और नौकरीपेशा लोगों की दिक्कतें” जैसे कोण से लिखना।
  • सामग्री और शोध – आँकड़े, रिपोर्ट, पुराने संदर्भ, विशेषज्ञों की राय, आम लोगों के अनुभव, किसी जगह का प्रत्यक्ष निरीक्षण – ये सब मिलकर फ़ीचर को भरोसेमंद बनाते हैं।
  • रचना और प्रवाह – आम तौर पर शुरुआत किसी रोचक दृश्य या घटना से, फिर पृष्ठभूमि, उसके बाद मुख्य चर्चा, बीच–बीच में उदाहरण और अंत में सार या सुझाव। इससे पाठक अंत तक जुड़ा रहता है।
  • भाषा और शैली – बातचीत जैसी सहज भाषा, लेकिन तथ्यों में ढिलाई नहीं। छोटे–लंबे वाक्यों का मिला–जुला प्रयोग, ज़रूरत हो तो छोटे संवाद या उद्धरण भी।
  • मानवीय पक्ष – आंकड़ों के पीछे छिपे “लोगों” को सामने लाना। बेरोज़गारी पर फ़ीचर लिखते समय केवल प्रतिशत न लिखकर दो–तीन युवाओं की वास्तविक कहानी शामिल करना, लेख को असरदार बना देता है।
  • चित्रात्मकता – दृश्य, गंध, आवाज़, रंग–रूप, मौसम आदि का हल्का–सा वर्णन फ़ीचर में जान डाल देता है, बशर्ते इसे ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा–चढ़ाकर न लिखें।

व्यावहारिक जोड़

रविवार को निकलने वाली पत्रिकाओं में जब कोई अच्छा फ़ीचर पढ़ने को मिलता है – जैसे किसी पुराने बाज़ार, किसी नदी या किसी सामाजिक आंदोलन पर – तो पाठक को ऐसा लगता है कि वह स्वयं वहाँ मौजूद है। यही फ़ीचर लेखन की असली ताक़त है।

Question 3: “भारत की सांस्कृतिक विविधता” विषय पर एक फ़ीचर का रूपरेखा सहित प्रारूप तैयार कीजिए।

विषय और दृष्टिकोण

भारत की सांस्कृतिक विविधता पर लिखते समय केवल “खाने–पीने और पोशाक” की सूची दे देना काफी नहीं है। ज़रूरी है कि पाठक को महसूस हो कि यह विविधता रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, मीडिया और लोकतांत्रिक जीवन में कैसे दिखाई देती है।

संभावित रूपरेखा

  • आरम्भिक दृश्य – किसी लंबी रेल–यात्रा का छोटा–सा दृश्य: एक डिब्बे में अलग–अलग भाषाएँ, अलग–अलग डिब्बों से आती खाने की खुशबू, मोबाइल पर चलते भिन्न–भिन्न गीत। इसी से पूरे देश के नक़्शे की ओर बढ़ना।
  • भाषाएँ और बोलियाँ – संविधान में दर्ज भाषाएँ, सैकड़ों बोलियाँ और फिर भी “नमस्ते”, “राम–राम”, “सलाम” जैसे सामान्य अभिवादन जो दूरी कम कर देते हैं।
  • त्योहारों की विविधता – दिवाली, ईद, गुरुपर्व, ओणम, बिहू, पोंगल आदि; क्षेत्र अलग–अलग, पर भाव–साझा – मिलना, बांटना और एक–दूसरे के घर जाना।
  • खान–पान और पहनावा – उत्तर के पराठे, दक्षिण की इडली–डोसा, पूर्व का माछ–भात, पश्चिम की दाल–बाटी; साथ में साड़ी, धोती, फुलकारी, पगड़ी, लहंगा, लुंगी आदि – रंगों से भरी दुनिया।
  • लोक–परंपराएँ, शिल्प और मीडिया – अलग–अलग क्षेत्रों की इमारतों की बनावट, लकड़ी-काम, बुनकरी, मिट्टी और धातु के बर्तन, दीवार–चित्र, लोक–कहानियाँ और नायकों की गाथाएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान को आकार देती हैं। आज के समय में क्षेत्रीय फ़िल्में, स्थानीय अख़बार, समुदाय–रेडियो और ऑनलाइन मंच इन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं।
  • एकता का सूत्र – अलग–अलग भाषा–संस्कृति के लोग संकट के समय (बाढ़, महामारी, भूकम्प आदि) कैसे एक–दूसरे की मदद के लिए खड़े हो जाते हैं – एक–दो छोटे उदाहरण।
  • समापन – निष्कर्ष कि “विविधता” केवल उत्सव मनाने की चीज़ नहीं, बल्कि इसे संरक्षित और सम्मानित रखना भी हमारी ज़िम्मेदारी है, ताकि अगली पीढ़ी भी इसे उसी समृद्ध रूप में देख सके।

व्यक्तिगत अनुभव का उपयोग

यदि विद्यार्थी इसमें अपने अनुभव जोड़ें – जैसे किसी दूसरे प्रदेश के मित्र के घर पर खाना खाना, या किसी दूसरे धर्म का पर्व मनाने में शामिल होना – तो फ़ीचर अधिक ईमानदार और प्रभावी बन जाता है।

Question 4: अपनी किसी यादगार यात्रा के आधार पर यात्रा–वृत्तांत लिखिए।

यात्रा–वृत्तांत की शैली

यात्रा–वृत्तांत केवल “यह देखा–वह देखा” की सूची नहीं होता। उसमें रास्ते की थकान, लोगों से मुलाकात, छोटी–बड़ी उलझनें, नयी जगह की खुशबू–आवाज़ें और मन के बदलाव सब शामिल होते हैं। नीचे एक संकेतात्मक ढाँचा दिया जा रहा है; विद्यार्थी अपनी यात्रा के अनुसार इसे भर सकते हैं।

संकेतात्मक ढाँचा (उदाहरण)

  • आरम्भ – जैसे: “पहली बार समुद्र देखने निकला तो सुबह की ठंडी हवा में सड़क कुछ अलग ही लग रही थी…” – ऐसा आरम्भ पाठक को तुरंत यात्रा में ले आता है।
  • तैयारी – दोस्तों के साथ योजना बनना, टिकट बुकिंग की उलझनें, घरवालों की चिंता, कम बजट में ज़रूरी सामान जुटाने की दौड़–भाग।
  • रास्ते के अनुभव – ट्रेन/बस में सहयात्रियों से बातचीत, किसी बुज़ुर्ग की कहानी, खिड़की से दिखते खेत–खलिहान, स्टेशन के चाय–ठेले, बच्चों की चहल–पहल।
  • गंतव्य पर पहुँचकर – समुद्र/पहाड़/ऐतिहासिक इमारत का पहला दृश्य, हवा की गंध, रात का माहौल, स्थानीय बाज़ार – संवेदनशील वर्णन।
  • स्थानीय जीवन – मछुआरों या किसानों की बस्तियाँ, स्थानीय बोली के कारण हुई मज़ेदार गलतफहमियाँ, वहाँ का भोजन, वहाँ के लोगों की मदद या आत्मीयता।
  • सीख और बदलाव – कैसे इस यात्रा ने “चार दीवारी” से बाहर निकालकर वास्तविक दुनिया से मिलवाया; प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी, अपने भीतर आत्मनिर्भरता महसूस हुई।

समापन

अंत में दो–तीन पंक्तियों में लिखें कि यदि आप दोबारा उस जगह जाएँ तो क्या अलग करना चाहेंगे – जैसे कम प्लास्टिक ले जाना, स्थानीय गाइड की मदद लेना, और यात्रा से सीखी बातों को रोज़मर्रा के जीवन में कैसे अपनाएँगे।

Question 5: अपने शहर के पर्यावरण (विशेष रूप से प्रदूषण) पर एक फ़ीचर तैयार कीजिए।

विषय की पृष्ठभूमि

आज लगभग हर शहर किसी–न–किसी रूप में प्रदूषण से जूझ रहा है – हवा, पानी, शोर, कचरा, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक कचरा आदि। फ़ीचर लिखते समय केवल शिकायत करना पर्याप्त नहीं; कारण, परिणाम और समाधान – तीनों पर संतुलित दृष्टि ज़रूरी है।

संभावित संरचना

  • आरम्भिक दृश्य – सर्दियों की धुंध में धुँधला शहर, या बरसात के बाद नालों से बहता प्लास्टिक – एक प्रभावशाली दृश्य से शुरुआत।
  • मुख्य समस्याएँ
    • वाहनों का धुआँ, इंडस्ट्री से निकलने वाली गैसें।
    • नालों और नदियों में गिरता सीवेज, पूजा–सामग्री, प्लास्टिक और रसायन।
    • शादी–समारोह, धार्मिक कार्यक्रम, निर्माण–स्थलों और हॉर्न से होने वाला शोर।
  • लोगों पर प्रभाव – बच्चों में अस्थमा और एलर्जी, बुज़ुर्गों को साँस की तकलीफ, साफ़ पार्कों की कमी के कारण सुबह की सैर करने वालों की संख्या घटना, पानी से फैलने वाली बीमारियाँ।
  • प्रशासन की पहल – नगर निगम के अभियान, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टें, “नो–हॉर्न ज़ोन”, मेट्रो या साइकिल ट्रैक जैसी योजनाएँ – जो भी आपके शहर में हो।
  • नागरिकों की जिम्मेदारी – घर पर कचरे का अलग–अलग वर्गीकरण, सार्वजनिक परिवहन या कार–पूलिंग, पेड़ लगाना, प्लास्टिक बैग छोड़कर कपड़े के थैले अपनाना, मोहल्ला–स्तर पर सफाई अभियान।
  • उम्मीद की किरण – किसी स्कूल, युवा समूह या मोहल्ला समिति की छोटी–सी सफलता कहानी – जैसे तालाब साफ़ करना, “नो–प्लास्टिक मार्केट”, या “रविवार को बिना वाहन” जैसी पहल।

अंतिम संदेश

समापन में यह विचार रख सकते हैं कि “शहर हमारा है” – केवल सरकार नहीं, बल्कि हर नागरिक की रोज़मर्रा की आदतें तय करती हैं कि आने वाली पीढ़ी को कैसा हवा–पानी मिलेगा।

Question 6: अपने प्रिय लेखक का साक्षात्कार लेने के लिए 20 प्रश्नों की सूची तैयार कीजिए।

अच्छे साक्षात्कार के लिए तैयारी

साक्षात्कार ऐसा हो जिसमें लेखक के जीवन, लेखन–यात्रा, सोच और संघर्ष – सबकी झलक मिल सके। नीचे दिये गए 20 प्रश्न विद्यार्थी अपने प्रिय लेखक के अनुसार थोड़ा बदल भी सकते हैं।

  • आपके बचपन की कोई याद जो आज भी बहुत गहराई से साथ बनी हुई है?
  • घर–परिवार का वातावरण आपके पढ़ने–लिखने पर किस तरह असर डालता रहा?
  • स्कूल या कॉलेज के समय आपने पहली बार क्या लिखा था – कविता, कहानी या कुछ और?
  • पहली प्रकाशित रचना कब और कहाँ छपी? उस समय आपको कैसा लगा?
  • कौन–कौन से लेखक या किताबें आपके लिए प्रेरणा–स्रोत रही हैं?
  • क्या कोई ऐसा शिक्षक या मित्र है जिसने आपको गंभीरता से लिखने के लिए प्रोत्साहित किया?
  • आप दिन में किस समय और किस तरह के वातावरण में लिखना पसंद करते हैं?
  • क्या आप शांति में बेहतर लिखते हैं या हलचल के बीच भी लिख लेते हैं?
  • किसी नई रचना की शुरुआत करते समय आपके मन में पहले पात्र आते हैं या कथानक?
  • कहानी, उपन्यास, कविता, निबंध – इन सबमें से आपको किस विधा में सबसे अधिक आत्मीयता महसूस होती है?
  • किसी एक रचना को पूरा करने में आपको सबसे ज़्यादा संघर्ष किस कारण से करना पड़ा?
  • आलोचना को आप कैसे लेते हैं – हतोत्साह की तरह या सुधार के अवसर की तरह?
  • आपके अनुसार आज के पाठक और आपके शुरुआती समय के पाठकों में क्या फर्क दिखता है?
  • सोशल मीडिया के दौर में साहित्य के लिए आपको सबसे बड़ा अवसर और सबसे बड़ा खतरा क्या लगता है?
  • लेखन और घर या नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन आप कैसे बनाते हैं?
  • क्या आपको लगता है कि लेखक को सामाजिक–राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बोलना चाहिए? क्यों?
  • कोई ऐसी रचना या पात्र जिसके कारण आपके अपने जीवन–दृष्टिकोण में बदलाव आया हो?
  • नए युवा लेखकों या छात्रों को आप सबसे ज़्यादा कौन–सी एक सलाह देना चाहेंगे?
  • आप “सफलता” को किस रूप में देखते हैं – पुरस्कार, बिक्री, या पाठकों का स्नेह?
  • आगे आप किस तरह की किताब या प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते हैं, उसका संक्षिप्त परिचय देंगे?

Question 7: अपने प्रिय लेखक का संक्षिप्त व्यक्तिचित्र (प्रोफ़ाइल/चरित्र–रेखा) तैयार कीजिए।

व्यक्तिचित्र की मूल बातें

व्यक्तिचित्र में हम किसी व्यक्ति के जीवन–वृत्त, स्वभाव, आदतें, संघर्ष, संवेदनशीलता और विचारों को जोड़कर एक ऐसा चित्र बनाते हैं, जिसे पढ़कर पाठक को लगे कि वह उस व्यक्ति से मिल आया है। नीचे एक काल्पनिक लेखक के आधार पर संरचना सुझायी जा रही है; विद्यार्थी इसमें अपने पसंदीदा लेखक का नाम और विवरण रख सकते हैं।

  • परिचय – दो–तीन पंक्तियों में लेखक की जगह, विधा और महत्व। जैसे – “समकालीन हिन्दी कहानी की दुनिया में राघव वशिष्ठ का नाम एक गंभीर और संवेदनशील कथाकार के रूप में लिया जाता है…”
  • बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि – छोटे कस्बे में जन्म, घर में पुस्तकालय न होना, रेडियो पर सुनी जाने वाली कहानियाँ, माँ–दादी के लोक–किस्से – कैसे इन सबने कल्पना–जगत तैयार किया।
  • शिक्षा और शुरुआती संघर्ष – कॉलेज में भेजी गयी शुरुआती रचनाओं का लौट आना, किराये के कमरे में रहकर लिखना, पार्ट–टाइम नौकरी करते हुए साहित्यिक गोष्ठियों में जाना।
  • लेखन–यात्रा – पहली छपी कहानी, उस पर मिली प्रतिक्रियाएँ; बाद के संग्रह, उपन्यास, अनुवाद या नाटक; किन वर्गों या समुदायों की आवाज़ उनकी रचनाओं में ज्यादा स्पष्ट सुनायी देती है।
  • दृष्टिकोण और विचार–धारा – स्त्री स्वतंत्रता, हाशिये पर खड़े समूहों, गाँव–शहर सम्बन्ध, हिंसा और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर उनका सोच और वह उनकी कहानियों में कैसे उतरता है।
  • निजी आदतें और स्वभाव – सुबह टहलते समय जेब में छोटी डायरी रखकर नोट्स बनाना, अपने पाठकों के पत्रों का जवाब स्वयं लिखना, मंच पर कम बोलने लेकिन साफ़–साफ़ बात रखने की प्रवृत्ति।
  • सम्मान, विवाद और आत्म–मूल्यांकन – पुरस्कार, विवादास्पद बयान, और लेखक का यह स्वीकार कि “मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान वह पाठक है जो किसी कहानी को पढ़कर थोड़ा कम अकेला महसूस करे।”
  • समापन – अंत में यह संकेत कि आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें किस रूप में याद कर सकती हैं – जैसे “हाशिये की आवाज़ों को मुख्यधारा तक लाने वाला कथाकार” या “संवेदनशील मानवीय रिश्तों का लेखक”।

Question 8: अपनी पढ़ी हुई किसी पुस्तक की समीक्षा लिखिए।

पुस्तक–समीक्षा का उद्देश्य

समीक्षा का काम केवल “पसंद आई/नहीं आई” कहना नहीं है। एक अच्छी समीक्षा पुस्तक की मज़बूत और कमजोर बातों, शैली, विषय और प्रासंगिकता का संतुलित आकलन करती है, ताकि पाठक तय कर सके कि उसे यह किताब पढ़नी चाहिए या नहीं।

संकेतात्मक समीक्षा (काल्पनिक पुस्तक)

पुस्तक – “नदी के उस पार” (उपन्यास)
लेखिका – सीमा वर्मा

  • विषय–परिचय – यह उपन्यास पहाड़ी कस्बे में रहने वाली तीन पीढ़ियों की स्त्रियों – दादी, माँ और बेटी – की कहानी है, जो अपने–अपने समय में परम्परा और बदलाव के बीच झूलती रहती हैं।
  • कथानक और संरचना – कथा वर्तमान और अतीत के बीच आती–जाती है, लेकिन अध्याय इस तरह बाँधे गये हैं कि पाठक उलझता नहीं। कुछ जगहों पर वर्णन लंबा खिंच जाता है, जिसे संक्षिप्त किया जा सकता था।
  • चरित्र–निर्माण – तीनों स्त्रियाँ स्वभाव से अलग हैं, फिर भी उनके बीच एक अदृश्य धागा है – गाँव न छोड़ पाने की दुविधा। सह–पात्र – जैसे प्रधान, मास्टर और मज़दूर – भी याद रह जाते हैं।
  • भाषा और शैली – सरल लेकिन भावपूर्ण हिन्दी; बीच–बीच में पहाड़ी शब्द, जो वातावरण को सजीव बनाते हैं। आम पाठक की सुविधा के लिए अंत में छोटा–सा शब्द–संग्रह होता तो और अच्छा रहता।
  • मुख्य संदेश और प्रासंगिकता – उपन्यास यह दिखाता है कि “विकास” केवल सड़क और मोबाइल टावर नहीं, बल्कि सम्मानजनक शिक्षा, रोज़गार और बराबरी के रिश्ते भी है। गाँव–शहर के बदलते रिश्तों के संदर्भ में यह विषय बहुत सामयिक लगता है।

संतुलित निष्कर्ष

कुल मिलाकर “नदी के उस पार” उन पाठकों के लिए उपयुक्त है जो धीरे–धीरे खुलने वाली संवेदनशील कहानियाँ पसंद करते हैं। तेज़ रफ़्तार रहस्य–कथा चाहने वाले पाठकों को यह धीमी लग सकती है, लेकिन रिश्तों की बारीकियाँ महसूस करने वाले पाठक इसे पसंद करेंगे।

Question 9: अपनी पसंद की किसी फ़िल्म की समीक्षा लिखिए।

फ़िल्म–समीक्षा का रूपरेखा

फ़िल्म की समीक्षा में कहानी तो बतानी पड़ती है, लेकिन इतना नहीं कि पूरी फ़िल्म का रोमांच ख़त्म हो जाए। अभिनय, संगीत, तकनीक, संदेश और मनोरंजन – इन सबको ध्यान में रखकर संतुलित राय देना ज़रूरी है।

संकेतात्मक समीक्षा (काल्पनिक फ़िल्म)

फ़िल्म – “द लास्ट बस”
निर्देशक – अनिरुद्ध सेन

  • संक्षिप्त कहानी – यह फ़िल्म पहाड़ी राज्य की आख़िरी चलती सरकारी बस के इर्द–गिर्द घूमती है, जो रोज़ सुबह गाँव से शहर जाती है। एक ही बस में बैठने वाले शिक्षक, नर्स, छात्र, दुकानदार और एक बुज़ुर्ग यात्री की नज़रों से पूरे इलाके की सामाजिक–आर्थिक तस्वीर दिखाई देती है।
  • निर्देशन और पटकथा – छोटे–छोटे दृश्यों के ज़रिये बेरोज़गारी, पलायन, पर्यटन, पारिवारिक तनाव आदि को जोड़ा गया है। कुछ हिस्सों में धीमी गति दर्शक की परीक्षा लेती है, पर अंत तक वही धीमापन फ़िल्म के मर्म का हिस्सा बन जाता है।
  • अभिनय – बस–चालक की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ अभिनेता ने बहुत कम संवादों में भी थकान और आत्मीयता दोनों को ज़ोरदार तरीके से दिखाया है। छात्र और नर्स की भूमिका में दिखने वाली युवा अभिनेत्रियाँ भी प्रभाव छोड़ती हैं।
  • संगीत और तकनीक – पृष्ठ–संगीत हल्का और दृश्य–अनुकूल है। कैमरा पहाड़ों, सँकरे रास्तों और छोटे–छोटे बाज़ारों को बहुत खूबसूरती से दिखाता है।
  • संदेश और असर – फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि यदि विकास की दौड़ में सार्वजनिक परिवहन और बुनियादी सुविधाएँ गायब हो जाएँ, तो दूर–दराज़ के गाँवों के लोग और भी अकेले पड़ जाते हैं।

निष्कर्ष

“द लास्ट बस” पारम्परिक “मसाला फ़िल्म” नहीं, बल्कि धीरे–धीरे खुलने वाली, भावुक लेकिन सन्तुलित कहानी है। जो दर्शक सामाजिक और मानवीय मुद्दों वाली फ़िल्में पसंद करते हैं, उन्हें यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए।

Question 10: संक्षिप्त टिप्पणियाँ (कोई दो) – आर्थिक फ़ीचर, विज्ञान फ़ीचर, बदलता गाँव, पर्यावरण केन्द्रित फ़ीचर

(1) आर्थिक फ़ीचर

जब अख़बार या पत्रिका में बजट, रोज़गार, कीमतों, बाज़ार या उद्योग से सम्बन्धित विस्तृत लेकिन सरल भाषा में लिखा गया लेख आता है, तो उसे आर्थिक फ़ीचर कहा जा सकता है। ऐसे फ़ीचर केवल आँकड़े नहीं गिनाते, बल्कि बताते हैं कि ये आँकड़े आम आदमी की जेब और जीवन को कैसे प्रभावित करेंगे – जैसे पेट्रोल के दाम बढ़ने से सब्ज़ियों के दाम पर क्या असर पड़ेगा। लेखक को तकनीकी शब्दों को भी उदाहरण देकर समझाना पड़ता है, तभी पाठक उससे जुड़ पाता है।

(2) विज्ञान आधारित फ़ीचर

विज्ञान–फ़ीचर का उद्देश्य किसी वैज्ञानिक खोज, तकनीक या स्वास्थ्य–संबंधी जानकारी को रोचक और समझने योग्य ढंग से प्रस्तुत करना है। इसमें अंतरिक्ष–यात्रा, नई दवाएँ, खेती की नयी पद्धतियाँ, ऊर्जा–संकट, वैक्सीन आदि विषय आ सकते हैं। लेखक के लिए दो बातें खास हैं – तथ्य शत–प्रतिशत सही हों, और उदाहरण इतने सरल हों कि विज्ञान–पृष्ठभूमि न रखने वाला पाठक भी समझ सके।

(3) बदलते गाँव पर फ़ीचर

“बदलता गाँव” विषय पर लिखते समय केवल इतना कहना कि “अब गाँव में भी मॉल और मोबाइल आ गये हैं” पर्याप्त नहीं है। देखना होगा कि इन बदलावों ने रिश्तों, खेती, रोज़गार और संस्कृति पर क्या असर डाला है। एक तरफ़ सड़क, बिजली, इंटरनेट जैसी सुविधाएँ बढ़ी हैं; दूसरी तरफ़ चौपाल पर बैठने की परम्परा, लोकगीत और सामूहिक काम–काज कई जगह कमज़ोर हुए हैं। अच्छा फ़ीचर दोनों पक्ष – नए अवसर और नयी चुनौतियाँ – संतुलित ढंग से सामने रखता है।

(4) पर्यावरण–केन्द्रित फ़ीचर

पर्यावरण पर लिखे जाने वाले फ़ीचर में जंगल, नदियाँ, वन्य–जीवन, जलवायु परिवर्तन, कचरा समस्या, हरित–क्षेत्र, वर्षा के ढंग, सूखा–बाढ़ आदि के साथ मनुष्य के सम्बन्ध की चर्चा होती है। उदाहरण के लिए किसी शहर की “आख़िरी बची नदी” पर फ़ीचर लिखा जा सकता है – कैसे वह कभी बच्चों का खेल–मैदान और किसानों की जान थी, और अब गंदे नाले में बदल रही है। ऐसे फ़ीचर केवल खतरे नहीं बताते, बल्कि छोटे–छोटे सकारात्मक प्रयासों – जैसे नदी–सफाई अभियान, वर्षा–जल संचयन, वृक्षारोपण – को भी जगह देते हैं, ताकि पाठक डर या अपराध–बोध में ही न फँसे, बल्कि कुछ करने की प्रेरणा भी पाए।


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