Solved Question Paper

BHDAE-182 Solved Question Paper

This IGNOU BHDAE-182 solved paper is designed for B.A. (Hindi – Major): Hindi language, classical/modern literature, criticism, and applied writing.

  • Course: Hindi Language and Communication
  • Programme: BAFHD
  • Session / Term: Jan 2025
  • Last updated: December 3, 2025

प्रश्न 1 : हिन्दी भाषा – स्वरूप और विकास (संक्षिप्त चर्चा)

हिन्दी भाषा का परिचय

हिन्दी आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक महत्त्वपूर्ण भाषा है। यह मुख्यतः उत्तर और मध्य भारत की बोलियों से विकसित हुई है, जिनमें ब्रज, अवधी, बुंदेली, हरियाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी आदि प्रमुख हैं। आज यह केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और तकनीक की भी प्रमुख भाषा बन चुकी है।

Advertisements

ऐतिहासिक विकास की मुख्य सीढ़ियाँ

  • प्राकृत और अपभ्रंश काल – प्राचीन भारत में संस्कृत से अनेक प्राकृतें बनीं, जिनसे आगे चलकर अपभ्रंश का रूप निकला। इन्हीं लोकभाषाओं से क्रमशः आधुनिक हिन्दी की बुनियाद तैयार हुई।
  • पुरानी हिन्दी – लगभग 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच रची गई रचनाओं (जैसे आल्हा, प्राचीन वीरगाथाएँ) की भाषा को पुरानी हिन्दी या अपभ्रंशोत्तर हिन्दी कहा जाता है।
  • मध्यकालीन हिन्दी – भक्ति और वीरगाथा परम्परा के संतों-कवियों (कबीर, तुलसी, सूर, मीरा आदि) ने अपनी-अपनी बोलियों में साहित्य रचकर हिन्दी को समृद्ध किया।
  • आधुनिक मानक हिन्दी – उन्नीसवीं–बीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली के आधार पर जो लिखित भाषा विकसित हुई, वही आज की मानक हिन्दी है।
  • संवैधानिक एवं प्रशासनिक स्थिति – भारत के संविधान में हिन्दी (देवनागरी लिपि) को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया है। अनेक राजकीय कार्यालयों, बैंकों, विश्वविद्यालयों और न्यायालयों में इसका व्यापक प्रयोग होता है।

आधुनिक समय में हिन्दी की भूमिका

  • सोशल मीडिया, टीवी चैनलों, वेब–सीरीज़ आदि के माध्यम से हिन्दी का नया, जीवंत रूप सामने आया है।
  • दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में बहु-भाषिक वातावरण होने के बावजूद नौकरी, बाज़ार और सार्वजनिक जीवन में हिन्दी एक साझा कड़ी का काम करती है।
  • विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के कारण भी हिन्दी की पहुँच वैश्विक हो रही है; कई देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी का विभाग या पाठ्यक्रम चल रहा है।

इस प्रकार हिन्दी भाषा का विकास निरंतर प्रक्रिया है, जो बोलियों, साहित्य, मीडिया और प्रौद्योगिकी से लगातार नई ऊर्जा प्राप्त करता रहा है।

प्रश्न 2 : ‘मूल स्वर’ – अर्थ और संक्षिप्त विवरण

स्वर क्या हैं?

जब बोलते समय वायु मुख से बिना किसी विशेष अवरोध के निकलती है, तब जो ध्वनि बनती है उसे स्वर कहते हैं। इन्हें उच्चारित करने में जिह्वा, होंठ या दाँतों से हवा को रोकना नहीं पड़ता, केवल स्वरयंत्र का कंपन पर्याप्त होता है।

मूल स्वर से क्या अभिप्राय है?

हिन्दी में वे स्वर जिन्हें सबसे बुनियादी माना जाता है, उन्हें सरल या मूल स्वर कहा जाता है। सामान्यतः इन्हें इस प्रकार गिनाया जाता है –

  • अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ

इन्हीं स्वरध्वनियों पर आगे चलकर दीर्घता, संयोजन या अनुस्वार आदि के प्रयोग से विविध ध्वनियाँ बनती हैं, इसलिए इन्हें मूल माना जाता है।

उच्चारण से जुड़ी कुछ विशेषताएँ

  • – सबसे साधारण और अल्प मात्रा वाला स्वर, लगभग हर शब्द में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है।
  • – अ का दीर्घ रूप; उच्चारण में मुँह अधिक खोलना पड़ता है, जैसे – ‘माँ’, ‘खा’।
  • इ / ई – आगे की ओर जिह्वा को थोड़ा ऊपर उठाकर बोला जाता है, जैसे – ‘इधर’, ‘नील’।
  • उ / ऊ – होंठ गोल कर के; ‘कुत्ता’, ‘सूखा’ जैसे शब्दों में।
  • – अपेक्षाकृत कम प्रयोग में आने वाला स्वर, ‘ऋतु’, ‘कृत’ आदि में मिलता है।
  • ए, ऐ, ओ, औ – ये संधि या योग से बने स्वर हैं, पर हिन्दी में इन्हें स्वतंत्र स्वर के रूप में पढ़ाया जाता है; जैसे – ‘देव’, ‘बैठ’, ‘दो’, ‘गौरव’।

छात्रों के लिए अभ्यास का आसान तरीका है कि वे दर्पण के सामने खड़े होकर एक–एक स्वर स्पष्ट बोलें और देखें कि मुँह व जिह्वा की स्थिति कैसे बदलती है; इससे उच्चारण शुद्ध होता है और श्रुतलेख, पाठ–कला आदि में मदद मिलती है।

प्रश्न 3 : उच्चारण–स्थान के आधार पर व्यंजन ध्वनियों का वर्गीकरण

व्यंजन और उच्चारण–स्थान

जिन ध्वनियों के उच्चारण में कहीं न कहीं वायु का अवरोध होता है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। यह अवरोध गले, जिह्वा, दाँत, होंठ आदि किसी भी अंग पर हो सकता है। जहाँ यह अवरोध बनता है, वहीं को उस ध्वनि का उच्चारण–स्थान माना जाता है।

मुख्य उच्चारण–स्थान और उनसे संबंधित व्यंजन

  • कंठ्य (गले से उच्चरित)
    • क, ख, ग, घ, ङ
    • इनका उच्चारण गले के भीतर होता है; जैसे – ‘कमल’, ‘घर’।
  • तालव्य (जिह्वा का अगला भाग तालु से लगता है)
    • च, छ, ज, झ, ञ, य, श
    • जैसे – ‘चमक’, ‘जग’, ‘यश’, ‘शक्ति’।
  • मूर्धन्य (जिह्वा का अग्र भाग ऊपर की ओर मोड़कर)
    • ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष
    • जैसे – ‘टोकरी’, ‘डाल’, ‘रथ’, ‘षड्यंत्र’।
  • दन्त्य (जिह्वा दाँतों से लगती है)
    • त, थ, द, ध, न, ल
    • जैसे – ‘तरह’, ‘दस’, ‘लाल’।
  • ओष्ठ्य (होंठों की सहायता से)
    • प, फ, ब, भ, म, व
    • जैसे – ‘फूल’, ‘बात’, ‘माटी’, ‘वचन’।
  • मिश्र उच्चारण–स्थान (दो अंग मिलकर काम करते हैं)
    • कंठ–तालव्य – य
    • कंठ–ओष्ठ्य – व
    • दन्त–ओष्ठ्य – फ, व (कुछ व्याख्याओं में)

छात्र यदि बोलते समय हाथ से गला, तालु या होंठ हल्के से छूकर देखें तो उन्हें स्पष्ट अनुभव होगा कि किस व्यंजन में कौन–सा अंग सबसे अधिक सक्रिय है; यही वास्तविक जीवन का उच्चारण–अभ्यास है।

प्रश्न 4 : ध्वनि–विज्ञान की संकल्पना और महत्त्व

ध्वनि–विज्ञान क्या है?

भाषा में प्रयुक्त ध्वनियों का वैज्ञानिक अध्ययन ध्वनि–विज्ञान कहलाता है। इसमें यह देखा जाता है कि ध्वनियाँ कैसे बनती हैं, कैसे सुनाई देती हैं और भाषा–प्रयोग में कैसे काम करती हैं। सरल शब्दों में कहें तो – बोलते समय जो आवाज़ें निकलती हैं, उनका शारीरिक, श्रव्य और भाषिक पक्ष मिलकर ध्वनि–विज्ञान का क्षेत्र बनाते हैं।

मुख्य पहलू

  • उच्चारण संबंधी पक्ष – कौन–सी ध्वनि के लिए फेफड़े, स्वरयंत्र, तालु, दाँत, होंठ आदि कैसे काम करते हैं; जैसे – कंठ्य, दन्त्य, ओष्ठ्य आदि वर्गीकरण।
  • श्रवण पक्ष – ध्वनि कान में कैसी सुनाई देती है, उसकी ऊँच–नीच, बल और क्रम क्या है; उदाहरण के लिए, स्वर ध्वनि की लंबाई या बल।
  • भाषिक पक्ष – किसी भाषा में कौन–कौन सी ध्वनियाँ अर्थ–भेद कराती हैं; जैसे ‘फल’ और ‘बल’ में केवल ‘फ’/‘ब’ बदलने से अर्थ बदल जाता है, इसलिए ये भिन्न ध्वनिमूल (फोनिम) हैं।

अध्ययन क्यों ज़रूरी है?

  • शुद्ध उच्चारण सिखाने के लिए; विशेषकर मंच–भाषण, समाचार–पाठ, अध्यापन आदि में।
  • वर्तनी–सुधार और वर्तनी–नीतियाँ बनाने में; किस ध्वनि के लिए कौन–सा अक्षर उपयुक्त है।
  • विकृत उच्चारण या बोलियों के अंतर को समझने और स्वीकार्य मानक रूप तय करने में।
  • भाषा–प्रशिक्षण (language training), स्पीच–थेरेपी और तकनीकी क्षेत्रों (speech recognition, text-to-speech) में।

जब विद्यार्थी ध्वनि–विज्ञान के बुनियादी नियम समझ लेते हैं तो वे किसी भी नई भाषा के ध्वनि–तंत्र को अपेक्षाकृत आसानी से सीख पाते हैं।

प्रश्न 5 : विशेषण – अर्थ और प्रमुख रूप

विशेषण की संक्षिप्त परिभाषा

जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम के गुण, संख्या, मात्रा, अवस्था या विशेषता को प्रकट करे, उसे विशेषण कहा जाता है। जैसे – ‘होशियार छात्र’, ‘तीन किताबें’, ‘कम पानी’ आदि। यहाँ ‘होशियार’, ‘तीन’ और ‘कम’ विशेषण हैं।

मुख्य प्रकार (सरल रूप में)

  • गुण बताने वाले विशेषण
    • ये किसी वस्तु या व्यक्ति के गुण–दोष, रंग–रूप, आकार, स्वभाव आदि का बोध कराते हैं।
    • जैसे – अच्छा, बुरा, बड़ा, छोटा, मीठा, कठोर।
  • संख्या या मात्रा बताने वाले विशेषण
    • कितनी या कितना – इसका उत्तर देने वाले शब्द; जैसे – एक, दो, कई, कुछ, आधा, ज़्यादा।
    • उदाहरण – ‘चार विद्यार्थी’, ‘थोड़ा दूध’, ‘काफी समय’।
  • सम्बंध दिखाने वाले विशेषण
    • ये बताते हैं कि कोई वस्तु किससे जुड़ी है या किसकी है; जैसे – ‘पैतृक घर’, ‘विद्यालय–बस’, ‘सरकारी योजना’।
  • संकेत करने वाले विशेषण
    • जो किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर इशारा करें; जैसे – यह, वह, ऐसा, वही, यही।
    • उदाहरण – ‘यह किताब मेरी है’, ‘ऐसा मौका बार–बार नहीं आता’।
  • प्रश्नवाचक और अनिश्चयवाचक
    • प्रश्नवाचक: कौन–सा, कैसा, कितने जैसे शब्द जिनसे प्रश्न बनता है – ‘कौन–सी फिल्म’, ‘कितने विद्यार्थी’।
    • अनिश्चयवाचक: कोई, कुछ, कई, आदि – ‘कई लोग’, ‘कुछ प्रश्न’।

लेखन या बोलते समय सही विशेषण चुन लेने से वाक्य अधिक स्पष्ट, सजीव और प्रभावशाली बन जाते हैं; यही व्यावहारिक संप्रेषण में इनकी असली उपयोगिता है।

प्रश्न 6 : क्रिया – अर्थ और रूपों की झलक

क्रिया की संकल्पना

जो शब्द किसी कार्य, अवस्था या घटित होने को व्यक्त करे, वह क्रिया कहलाती है; जैसे – ‘लिखना’, ‘खाना’, ‘बैठना’, ‘सोना’, ‘होना’, ‘लगना’ आदि। क्रिया ही वाक्य को समय (काल), संख्या और पुरुष से जोड़ती है – ‘मैं आता हूँ’, ‘वे आएंगे’।

कुछ उपयोगी प्रकार (सरल वर्गीकरण)

  • सकर्मक क्रिया – जिस क्रिया के लिए किसी कर्म (object) की आवश्यकता हो; जैसे – ‘मैं पत्र लिखता हूँ’ (पत्र = कर्म)। ‘खाना’, ‘पढ़ना’, ‘बनाना’ आदि।
  • अकर्मक क्रिया – जिसे कर्म की आवश्यकता न हो; जैसे – ‘सूरज निकला’, ‘बच्चा हँस रहा है’।
  • स्थिति या अवस्था व्यक्त करने वाली क्रिया – ‘होना’, ‘लगना’, ‘दिखना’ जैसी क्रियाएँ जो किसी स्थिति को व्यक्त करती हैं – ‘लाइट जा रही है’, ‘मौसम अच्छा लग रहा है’।
  • सहायक क्रियाएँ – मुख्य क्रिया के साथ मिलकर काल, वाच्य या भाव सूचित करती हैं; जैसे – ‘हूँ, है, था, रहे हैं, चुका, लिया, देना, जाना’ – ‘काम किया जा रहा है’, ‘खाना खा लिया गया है’।
  • यौगिक क्रिया – दो क्रियाओं के मिलकर बनने से; जैसे – ‘देख लेना’, ‘लिख देना’, ‘उठ जाना’। यहाँ दूसरी क्रिया क्रिया–वाचक अर्थ को थोड़ा बदल देती है – जैसे ‘देखना’ और ‘देख लेना’ में अंतर।

दैनिक बोलचाल में हम अक्सर सहायक क्रिया छोड़ देते हैं – ‘मैं जा रहा’ की जगह ‘मैं जा रहा हूँ’ – पर औपचारिक लेखन और भाषण में क्रिया–रूपों की शुद्धता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 7 : रचना के आधार पर वाक्य–भेद

वाक्य और उसकी रचना

शब्दों के सुव्यवस्थित समूह से जो पूर्ण अर्थ प्रकट हो, उसे वाक्य कहते हैं। वाक्य की रचना (संरचना) को ध्यान में रखकर हिन्दी में सामान्यतः तीन मुख्य प्रकार माने जाते हैं।

1. सरल वाक्य

  • जिस वाक्य में केवल एक ही कर्ता–क्रिया संबंध होता है और कोई उपवाक्य न हो, उसे सरल वाक्य कहते हैं।
  • उदाहरण – ‘बच्चे खेल रहे हैं।’ ‘मैं पुस्तक पढ़ता हूँ।’
  • प्रयोग – निर्देश, सूचना, सामान्य कथन आदि में; जैसे नोटिस, सूचना-पट, संदेश।

2. मिश्र वाक्य

  • जिस वाक्य में एक मुख्य वाक्य के साथ एक या अधिक उपवाक्य जुड़े हों, और वे एक-दूसरे पर आश्रित हों, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं।
  • उदाहरण – ‘जब बारिश होती है, तब हम घर के भीतर खेलते हैं।’
  • यहाँ ‘जब बारिश होती है’ उपवाक्य है और ‘हम घर के भीतर खेलते हैं’ मुख्य वाक्य।

3. मिश्रित वाक्य

  • दो या दो से अधिक स्वतंत्र वाक्य जब संयोजकों (और, लेकिन, अथवा, तथा आदि) से मिलकर एक लम्बा वाक्य बनाते हैं, तो उसे मिश्रित वाक्य कहा जाता है।
  • उदाहरण – ‘मैं कॉलेज गया और मेरे मित्र दफ्तर चले गए।’ यहाँ दोनों खंड अपने–आप में अलग–अलग वाक्य बन सकते हैं।
  • बहस, रिपोर्ट लेखन और निबंध में तर्क जोड़ने के लिए इस तरह के वाक्य खूब काम आते हैं।

प्रयोग का अनुभव यह बताता है कि लिखित हिन्दी में तीनों प्रकार के वाक्यों का संतुलन भाषा को सहज बनाता है – बहुत अधिक मिश्र/मिश्रित वाक्य पाठक को थका देते हैं, जबकि केवल सरल वाक्य लेखन को बच्चों जैसा बना सकते हैं।

प्रश्न 8 : प्रस्तुतीकरण कौशल – प्रमुख रूप और व्यवहारिक संकेत

प्रस्तुतीकरण कौशल से आशय

कक्षा, मंच, बैठक या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किसी विषय को सुनने वालों के सामने व्यवस्थित, रोचक और प्रभावशाली ढंग से रखना प्रस्तुतीकरण या प्रेज़ेन्टेशन कौशल कहलाता है। इसमें भाषा, आवाज़, हावभाव, सामग्री, माध्यम – सब मिलकर काम करते हैं।

कुछ महत्त्वपूर्ण रूप

  • मौखिक प्रस्तुति – भाषण, चर्चा, सेमिनार, मौखिक रिपोर्ट, इंटरव्यू आदि। इसमें आवाज़ की स्पष्टता, गति, विराम, नेत्र–संपर्क, उदाहरण और हास्य–विनोद का संतुलित प्रयोग ज़रूरी है।
  • दृश्य–श्रव्य प्रस्तुति – पावरपॉइंट, वीडियो, इन्फ़ोग्राफ़िक, पोस्टर, चार्ट, मॉडल आदि की मदद से किया गया प्रस्तुतिकरण। यहाँ स्लाइडों पर बहुत अधिक टेक्स्ट से बचना चाहिए; मुख्य बिंदु बुलेट–पॉइंट में और विवरण बोलकर दिया जाए।
  • लिखित प्रस्तुति – रिपोर्ट, प्रोजेक्ट, पोर्टफोलियो, ब्लॉग आदि। क्रम, शीर्षक, अनुच्छेद–विन्यास, भाषा की शुद्धता और सन्दर्भ–सूची इसकी आत्मा हैं।
  • समूह प्रस्तुति – जब कई विद्यार्थी मिलकर एक विषय प्रस्तुत करते हैं; इसमें भूमिका–विभाजन, समय–प्रबंधन और एक–दूसरे का सहयोग अत्यन्त ज़रूरी है।

छात्रों के लिए व्यावहारिक सुझाव

  • प्रस्तुति से पहले कम से कम दो–तीन बार घर पर या मित्रों के सामने अभ्यास करें; समय भी नापें।
  • आरम्भ और समापन की पंक्तियाँ पहले से लिखकर याद कर लें; बीच का भाग बिंदुवार लिखकर समझ लें।
  • स्लाइड या नोट्स को शब्दशः पढ़ने के बजाय, श्रोता की ओर देखकर संवाद की तरह बोलें।
  • प्रश्न–उत्तर चरण में शांत रहकर प्रश्न पूरा सुनें, फिर ही उत्तर दें; अगर उत्तर न पता हो तो ईमानदारी से स्वीकार कर बाद में जानकारी देने का वादा करें।

इस तरह प्रस्तुतीकरण कौशल केवल परीक्षा के प्रश्न का विषय नहीं, बल्कि करियर के लगभग हर क्षेत्र में सफलता की अनिवार्य शर्त बन चुका है।

प्रश्न 9 : संक्षिप्त टिप्पणियाँ (किसी दो पर लिखने के स्थान पर सभी पर सहायता)

(1) मौखिक संप्रेषण

जब संदेश शब्दों के माध्यम से सीधे बोलकर दिया जाता है, तो उसे मौखिक संप्रेषण कहते हैं – जैसे आमने–सामने बातचीत, टेलीफ़ोन, ऑनलाइन मीटिंग, कक्षा–शिक्षण, भाषण आदि। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है; सामने वाला अभी–अभी की बात पर तुरंत प्रश्न पूछ सकता है या सहमति–असहमति जता सकता है।

  • फायदा – तीव्र गति, मानवीय स्पर्श, भाव–भंगिमा का सहारा।
  • सीमा – यदि बात रिकॉर्ड न हो तो बाद में याद रखना कठिन, भावनाओं के प्रभाव से गलतफ़हमी की संभावना।

(2) वर्ण और लिपि

भाषा की सबसे छोटी ध्वनि–इकाई को वर्ण और उसे लिखने के लिए प्रयुक्त चिह्न–समूह को लिपि कहते हैं। हिन्दी की मानक लिपि देवनागरी है, जिसमें स्वर और व्यंजन के लिए अलग–अलग चिन्ह हैं और मात्राओं के माध्यम से ध्वनि–परिवर्तन दिखाया जाता है। एक ही ध्वनि यदि अलग–अलग लिपियों में लिखी जाए (जैसे हिन्दी, उर्दू, रोमन), तो हमें समझ आता है कि वर्ण और लिपि में अंतर है।

(3) खड़ी बोली

खड़ी बोली पश्चिमी हिन्दी की प्रमुख बोली है, जो दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती रही है। आधुनिक मानक हिन्दी का आधार यही खड़ी बोली मानी जाती है। उन्नीसवीं–बीसवीं शताब्दी में समाचार–पत्रों, शिक्षा और प्रशासन में इसी रूप को प्राथमिकता मिलने के कारण आज जो ‘पुस्तकी हिन्दी’ पढ़ाई जाती है, वह मूलतः खड़ी बोली पर आधारित है।

(4) उपभाषा

किसी भाषा के भीतर प्रादेशिक या सामाजिक स्तर पर पाए जाने वाले अलग–अलग रूपों को उपभाषाएँ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, हिन्दी की उपभाषाओं में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, मगही आदि का उल्लेख किया जाता है। इन उपभाषाओं का शब्द–भंडार, उच्चारण और कुछ व्याकरणिक नियम मानक हिन्दी से भिन्न हो सकते हैं, पर सबकी जड़ एक ही बड़े भाषा–परिवार में होती है।

रोजमर्रा के अनुभव में हम देखते हैं कि गाँव–कस्बों में लोग अपनी उपभाषा में बोलते हैं, लेकिन स्कूल, दफ्तर या टीवी पर आते ही मानक हिन्दी का सहारा लेते हैं; यही द्विभाषिक–सा व्यवहार हिन्दी क्षेत्र की एक स्वाभाविक विशेषता है।


These solutions have been prepared and corrected by subject experts using the prescribed IGNOU study material for this course code to support your practice and revision in the IGNOU answer format.

Use them for learning support only, and always verify the final answers and guidelines with the official IGNOU study material and the latest updates from IGNOU’s official sources.